खुर्जा। ।भारत पुष्प। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा युवाओं में खेल भावना, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, राष्ट्रभक्ति, संस्कार एवं सामाजिक दायित्व की भावना विकसित करने के उद्देश्य से युवा खेल संगम कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में खुरजा नगर के अनेक युवा बंधुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम के अंतर्गत युवाओं के लिए रस्साकशी, कबड्डी एवं खो-खो जैसी पारंपरिक एवं सामूहिक खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। इन खेलों के माध्यम से युवाओं ने न केवल अपनी शारीरिक क्षमता एवं कौशल का प्रदर्शन किया, बल्कि टीम भावना, आपसी सहयोग, अनुशासन और नेतृत्व का भी परिचय दिया। कार्यक्रम मे अनिल, सह जिला संघचालक, सामर्थ्य, नगर सह संघचालक एवं सरवचन, विभाग सेवा प्रमुख द्वारा पुष्प अर्पित कर किया गया। कार्यक्रम में सरवचन, विभाग सेवा प्रमुख मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। जिस देश का युवा जागरूक, संस्कारित, अनुशासित और राष्ट्र के प्रति समर्पित होता है, उस राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल होता है। अपने संबोधन में उन्होंने विद्यार्थियों को शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को समझने का आह्वान किया। उन्होंने युवाओं से प्रश्न किया—“हम क्यों पढ़ रहे हैं?” उन्होंने कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी को अपने जीवन में शिक्षा प्राप्त करने का लक्ष्य स्पष्ट रखना चाहिए। पढ़ाई का उद्देश्य केवल अच्छी नौकरी प्राप्त करना या अधिक से अधिक पैसा कमाना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को ज्ञानवान, संस्कारित, चरित्रवान, जिम्मेदार एवं अच्छा नागरिक बनाना है।

शिक्षा हमें यह सिखाती है कि हम अपने माता-पिता का सम्मान एवं सेवा करें, समाज के प्रति अपने दायित्व को समझें, देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें तथा आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रहित में अपना योगदान देने के लिए सदैव तैयार रहें। उन्होंने युवाओं से कहा कि जीवन में केवल अपने भविष्य के बारे में ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य के बारे में भी सोचना चाहिए। सरवचन ने भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा परंपरा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी। गुरुकुलों में विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन, आत्मनिर्भरता, संयम, सेवा, कर्तव्यबोध और राष्ट्रभाव का प्रशिक्षण दिया जाता था। उन्होंने गृहत्याग के विषय को समझाते हुए बताया कि गुरुकुल में जाने का अर्थ अपने माता-पिता या परिवार से संबंध समाप्त करना नहीं था। इसका उद्देश्य विद्यार्थी को कुछ समय के लिए पारिवारिक सुख-सुविधाओं से दूर रखकर गुरु के सान्निध्य में ज्ञान, अनुशासन और जीवन के आवश्यक संस्कार प्रदान करना था। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास महत्वपूर्ण माना जाता था। विद्यार्थी केवल विषयों का ज्ञान प्राप्त नहीं करता था, बल्कि वह अपने जीवन को व्यवस्थित करना, दूसरों का सम्मान करना, श्रम करना और समाज के लिए उपयोगी बनना भी सीखता था। कार्यक्रम में विद्यार्थियों के जीवन में आवश्यक गुणों पर भी चर्चा की गई। विद्यार्थी के पाँच लक्षण बताते हुए युवाओं को निरंतर अध्ययन, जिज्ञासा, अनुशासन, परिश्रम और ज्ञान प्राप्ति के प्रति समर्पण का संदेश दिया गया। विद्यार्थी जीवन मनुष्य के निर्माण की आधारशिला है। इस समय प्राप्त संस्कार और आदतें आगे चलकर पूरे जीवन को प्रभावित करती हैं। इसलिए युवाओं को समय का सदुपयोग करते हुए अपने व्यक्तित्व एवं चरित्र निर्माण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सरवचन ने कहा कि आज के युवा केवल अपने करियर और व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहें। उन्हें यह भी विचार करना चाहिए कि देश के लिए वे क्या कर सकते हैं। युवा देश की ऊर्जा, सामर्थ्य और भविष्य हैं। यदि युवा अपने समय, प्रतिभा और शक्ति का उपयोग समाज एवं राष्ट्र के निर्माण में करें तो भारत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया जा सकता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में राष्ट्र प्रथम, समाज हित और सेवा भावना को स्थान दें। युवाओं को अपनी भारतीय संस्कृति, परंपराओं एवं संस्कारों के प्रति जागरूक करते हुए कहा गया कि हमें अपनी पहचान को समझना और उस पर गर्व करना चाहिए। उन्होंने युवाओं से कहा कि हमें यह जानना चाहिए कि हम कौन हैं, हमारी संस्कृति क्या है और हमारे पूर्वजों ने समाज एवं राष्ट्र के लिए क्या योगदान दिया है। “हम हिंदू हैं”—इस भाव को अपनी सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना के रूप में समझते हुए अपने जीवन में अच्छे संस्कारों को अपनाना चाहिए। युवाओं को भारत की गौरवशाली परंपरा, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रभक्त महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश दिया गया। युवा खेल संगम में आयोजित कबड्डी, खो-खो एवं रस्साकशी जैसी प्रतियोगिताओं ने पूरे वातावरण में उत्साह और उमंग भर दिया। खेल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ व्यक्ति में अनुशासन, निर्णय क्षमता, नेतृत्व, धैर्य, सहयोग एवं संघर्ष करने की क्षमता विकसित करते हैं। रस्साकशी में सामूहिक प्रयास और एकता का महत्व दिखाई दिया, कबड्डी में साहस एवं रणनीति का परिचय मिला और खो-खो में गति, सजगता एवं टीम भावना का प्रदर्शन हुआ। कार्यक्रम के माध्यम से युवाओं को संदेश दिया गया कि— पढ़ाई करें तो उद्देश्य के साथ, खेलें तो अनुशासन के साथ, जीवन जिएँ तो संस्कारों के साथ, समाज में रहें तो सेवा भाव के साथ, और राष्ट्र के लिए सोचें तो समर्पण के साथ। युवा अपने जीवन में ऐसा लक्ष्य निर्धारित करें जिससे उनके परिवार को गर्व हो, समाज को उनसे लाभ मिले और राष्ट्र को उनकी प्रतिभा एवं ऊर्जा का उपयोग प्राप्त हो। युवा खेल संगम का उद्देश्य केवल खेल प्रतियोगिताएँ आयोजित करना नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक दृढ़ता, सामाजिक संवेदनशीलता, नेतृत्व क्षमता, अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रभाव का विकास करना रहा। कार्यक्रम में उपस्थित सभी युवा बंधुओं ने पूरे उत्साह के साथ विभिन्न गतिविधियों में सहभागिता की। खेलों के माध्यम से युवाओं में आपसी परिचय, सहयोग और बंधुभाव भी मजबूत हुआ। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि स्वस्थ शरीर, संस्कारित मन और राष्ट्र के प्रति समर्पित विचारों वाला युवा ही सशक्त समाज और मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।

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