खुर्जा। ।भारत पुष्प। सरस्वती विद्या मंदिर अखंड भारत संकल्प दिवस के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों एवं उपस्थित जनसमुदाय को भारत की गौरवशाली ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत, समय-समय पर हुए राजनीतिक विभाजन तथा उसके परिणामों के बारे में जानकारी दी गई। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिला प्रचारक ने कहा कि भारत केवल वर्तमान राजनीतिक सीमाओं में बंधा हुआ भू-भाग नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित एक विराट सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का नाम है। भारत की सांस्कृतिक चेतना ने हिमालय से समुद्र तक और भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक क्षेत्रों को सदियों तक एक व्यापक सांस्कृतिक सूत्र में जोड़े रखा। उन्होंने कार्यक्रम में प्रचलित ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि “हमारा 83 लाख वर्ग किलोमीटर का भू-भाग था और आज वर्तमान भारत लगभग 32,87,263 वर्ग किलोमीटर में रह गया है।” उन्होंने उपस्थित लोगों से प्रश्न किया कि आखिर ऐसी कौन-कौन सी परिस्थितियाँ बनीं, जिनके कारण भारतीय उपमहाद्वीप का इतना बड़ा भू-भाग अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों में बंटता चला गया। उन्होंने कहा कि इतिहास में भारत का राजनीतिक स्वरूप हमेशा एक जैसा नहीं रहा। अलग-अलग कालखंडों में विभिन्न राजवंशों और साम्राज्यों ने भारतीय उपमहाद्वीप के अलग-अलग हिस्सों पर शासन किया। वहीं दूसरी ओर भारतीय सभ्यता, संस्कृति, व्यापार, तीर्थ परंपराओं, भाषाओं और ज्ञान-विज्ञान ने इस विस्तृत क्षेत्र को निरंतर जोड़ने का कार्य किया। जिला प्रचारक ने बताया कि ब्रिटिश काल में भारतीय उपमहाद्वीप के प्रशासनिक स्वरूप में भी बड़े परिवर्तन हुए। 1937 में बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को ब्रिटिश भारत से अलग प्रशासनिक इकाई बनाया गया। इसके बाद 1947 में ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ और भारत तथा पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने। पंजाब और बंगाल का भी विभाजन हुआ। उन्होंने आगे बताया कि 1947 का विभाजन केवल राजनीतिक सीमा-निर्धारण नहीं था, बल्कि इसके साथ करोड़ों लोगों का विस्थापन हुआ और व्यापक हिंसा एवं मानवीय त्रासदी सामने आई। ब्रिटिश नेशनल आर्काइव्स के अनुसार विभाजन के समय लगभग 1.5 करोड़ से अधिक लोगों ने नई सीमाओं के आर-पार पलायन किया। उन्होंने कहा कि इसके बाद 1971 में पाकिस्तान का पूर्वी भाग अलग होकर बांग्लादेश के रूप में अस्तित्व में आया। इस प्रकार 1947 में बना पाकिस्तान भी दो भौगोलिक हिस्सों में लंबे समय तक एक साथ नहीं रह सका और अंततः उसका पूर्वी भाग अलग राष्ट्र बन गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतिहास की विभिन्न घटनाओं को एक ही प्रकार के “विभाजन” के रूप में देखना उचित नहीं है। कुछ क्षेत्र ब्रिटिश प्रशासनिक पुनर्गठन के कारण अलग हुए, जबकि 1947 और 1971 की घटनाएँ स्वतंत्र राष्ट्रों के निर्माण से संबंधित थीं। इसलिए इतिहास को तथ्यों और संदर्भों के साथ समझना आवश्यक है। कार्यक्रम में भारत के गौरवशाली अतीत का उल्लेख करते हुए जिला प्रचारक ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, दर्शन, साहित्य, कला, शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। भारत की शिक्षा परंपरा, प्राचीन विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक उपलब्धियों और समुद्री व्यापार ने इसे विश्व के महत्वपूर्ण सभ्यतागत केंद्रों में स्थान दिया। भारतीय गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और दर्शन की परंपराओं ने मानव ज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति केवल उसके भू-भाग में नहीं थी, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान और आत्मबोध में थी। इसी कारण राजनीतिक उतार-चढ़ाव और अनेक आक्रमणों के बावजूद भारतीय सांस्कृतिक चेतना आज तक जीवित है। जिला प्रचारक ने कहा कि भारत के विभाजन से भारत को भौगोलिक, सामाजिक और रणनीतिक स्तर पर बड़ी क्षति हुई। विभाजन की पीड़ा आज भी लाखों परिवारों की स्मृतियों में जीवित है। लेकिन इतनी बड़ी क्षति के बावजूद भारत आज भी अटल खड़ा है और निरंतर विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में अपनी मातृभूमि के प्रति मातृत्व और आत्मीयता का भाव आज भी जीवित है। यही भाव भारत को बार-बार कठिन परिस्थितियों से उबरने की शक्ति देता है। उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद बने कुछ देशों ने राजनीतिक अस्थिरता, संघर्ष, आतंकवाद, आर्थिक चुनौतियों अथवा आंतरिक सत्ता-संघर्ष जैसी गंभीर परिस्थितियों का सामना किया है। परंतु इन परिस्थितियों को किसी देश की जनता या उसकी पूरी सभ्यता के अस्तित्व पर सामान्यीकृत करना उचित नहीं है। भारत की विशेषता यह है कि विभाजन और अनेक ऐतिहासिक चुनौतियों के बावजूद उसने लोकतांत्रिक व्यवस्था, आर्थिक विकास और वैज्ञानिक प्रगति के माध्यम से अपनी वैश्विक स्थिति को लगातार मजबूत किया है। कार्यक्रम में कहा गया कि अखंड भारत संकल्प दिवस का उद्देश्य केवल अतीत का गौरवगान करना नहीं, बल्कि इतिहास से सीख लेकर भविष्य का निर्माण करना है। जिला प्रचारक ने कहा कि जो गलतियाँ अतीत में हुईं, उनका अध्ययन करना, उनके कारणों को समझना और उनसे सीख लेकर भविष्य में उनकी पुनरावृत्ति रोकना आवश्यक है। आने वाली पीढ़ी को अपने इतिहास, अपनी सांस्कृतिक विरासत और विभाजन की पीड़ा से परिचित कराना भी समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि इतिहास को स्मरण करने का अर्थ किसी के प्रति घृणा पैदा करना नहीं, बल्कि अपनी विरासत को समझना, अपनी कमियों से सीखना और राष्ट्र के भविष्य को अधिक मजबूत बनाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने अपने इतिहास में बहुत कुछ खोया, लेकिन भारत समाप्त नहीं हुआ। आज भी भारत अपनी सांस्कृतिक चेतना के साथ खड़ा है और शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, रक्षा तथा अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में निरंतर आगे बढ़ रहा है। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने भारत की एकता, अखंडता, सांस्कृतिक विरासत और उज्ज्वल भविष्य के प्रति अपने संकल्प को दोहराया तथा आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से जोड़ने का आह्वान किया।“इतिहास केवल बीते हुए समय की कहानी नहीं, बल्कि भविष्य को सही दिशा देने वाला अनुभव है। जो समाज अपने इतिहास से सीखता है, वही अपने भविष्य को अधिक मजबूत बना सकता है।”
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