–रामलीला के मंचन में लंकापति रावण नें सूरज चंदा को किया कैद, नारद मोह लीला का हुआ मंचन

सिकंद्राबाद। ।भारत पुष्प/पवन शर्मा। नगर मे रामलीला महोत्सव का शुभारंभ नगर पालिका चैयरमैन डाक्टर प्रदीप दीक्षित नें नारियल तोड़कर कर किया। उसके बाद श्री गणेश जी महाराज जी की आरती वंदन कर उनके रथ को रवाना किया और हनुमान चौक पर लंकापति दशानन (रावण ) ने सूरज-चंदा को बंदी बना लिया और उनको लंका मे साफ-सफाई व पानी भरने का कार्यभार सौंप दिया। लीला का शुभारंभ रामलीला मैदान में क्षेत्रीय विधायक लक्ष्मीराज सिंह व नगर चैयरमैन डाक्टर प्रदीप दीक्षित ने फीता काटकर किया। उसके बाद नारद मोह लीला की लीला का मंचन कथा वाचक दामोदर दास शर्मा के मुखारबिंद द्वारा रसास्वादन कराया गया। रामलीला में  नारद मोह लीला के मंचन में का वर्णन किया गया। रामायण में लिखे अनुसार व कथा वाचक के द्वारा रसास्वादन कराये जा रहे अनुसार जब ब्रम्हा पुत्र नारद के मन में आया की तपस्या कर कामदेव पर विजय प्राप्त करनी चाहिए इसलिए नारद जी ने हिमालय की कदंराओ में घोर तपस्या की जिससे इंद्र का सिंहासन हिल गया इस हालत को देखकर इंद्र महाराज घबरा गये और अपने मंत्री द्वारा पता लगाया की किस कारण हमारा सिंहासन हिला कौन तपस्या कर रहा है। सबकुछ मालूम होने पर इंद्र महाराज नें कामदेव को नारद की तपस्या भंग करने को भेजा कामदेव ने नर्तकियों द्वारा नारद का मोह भंग कराने की कोशिश की जो नाकाम हुई तब कामदेव ने भरपूर कोशिश की वह भी नाकाम रहा। तब जाकर कामदेव नारद के चरणों में लेटकर गलती की माफी मांगी और चला गया इस प्रकार नारद जी नें कामदेव पर विजय पा ली और नारद जी को अंहकार हो गया की मेने कामदेव को जीत लिया और सबसे पहले भगवान भोलेनाथ के पास जाकर सबकुछ बताया की मेने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली है तब भोलेनाथ ने कहा की यह बात किसी से ना कहना मगर नारद जी नही माने और अपने पिता ब्रम्हाजी के जाकर सबकुछ बता दिया उन्होने भी वही कहा की यह बात किसी से ना कहना मगर नारद जी नही माने वों अंहकारवश विष्णु जी के पास पहुंच गये और सबकुछ बता दिया तभी विष्णु जी सबकुछ समझ गए की नारद जी को अंहकार हो गया है इनका अंहकार समाप्त करना होगा। इस प्रकार विष्णु जी ने नारद जी के अंहकार को नष्ट करने हेतू  एक मायावी नगर बनाया उस नगर के राजा का नाम शिलनिधी था उसके एक कन्या की शादी होनी थी उस कन्या को देखकर नारद मोहित हो गए और विष्णु के पास जाकर उनका जैसा रुप मांग लिया इस बात को सुनकर विष्णु जी ने नारद जी बंदर का रुप दे दिया वो बंदर के रुप में उस राजा के यहा जा धमके और शादी की इच्छा करने के लिए सिंहासन पर बिराजमान हो गये। नारद जी का रुप देकर वह कन्या व सभी राजा हँसी उड़ाने लगे इस हंसी का कारण जानकर नारद जी बहुत क्रोधित हुए ओर विष्णु जी के पास जाकर नाराज होकर विष्णु जी को श्राप दे दिया इस श्राप को स्वीकार कर विष्णु जी ने मिशन नारद को आशीर्वाद देकर उनका अंहकार नष्ट कर दिया। ओर पृथ्वी लोक पर अवतार लेने की तैयारी मे जुट गये। यहा तक की लीला का सार सुविख्यात कथा वाचक दामोदर दास शर्मा वृंदावन वालों ने रसास्वादन कराया।

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