खुर्जा। ।भारत पुष्प। भारत विकास परिषद का गुरु तेग बहादुर बलिदान दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ गुरु तेग बहादुर जी के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ सभी सदस्यों द्वारा चित्र पर पुष्प अर्पित किए गए शाखा के अध्यक्ष प्रेम प्रकाश अरोरा ने अतिथियों का संबोधन के द्वारा स्वागत किया सचिव पीयूष तायल और कोषाध्यक्ष कृष्ण अवतार बंसल ने अतिथियों को अंक वस्त्र प्रदान कर उनका स्वागत किया। इस अवसर पर कार्यक्रम संयोजक शलभ पांडे इंद्रजीत सिंह दुग्गल ने धन्यवाद व स्मृति चिन्ह प्रदान किया सभा में अजय गर्ग अजीत मित्तल सुनील गुप्ता कपिल अग्रवाल डॉक्टर अनिल गुप्ता राजेंद्र अग्रवाल चंद्र प्रकाश तायल विनीत आर्य विपिन गोयल राजीव वार्ष्णेय नितिन सिंघल महेश पोद्दार विवेक अग्रवाल आशीष वैद्य मुकेश रोहिला आदि कई सदस्य ने भाग लिया। गुरु तेग बहादुर बलिदान दिवस का आयोजन भारत विकास खुर्जा शाखा द्वारा जगजीत सिंह गुरुद्वारा सिंह सभा के मुख्य अतिथि करतार सिंह सभा अध्यक्ष के रूप में किया गया दोनों अतिथियों ने गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान और उनको हिंद की चादर क्यों कहा गया इस पर अपना संबोधन सभी सदस्यों के समक्ष रखा। बताया गया कि श्री गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस के आयोजन पर। वह सिखों के नौवें गुरु थे, जिन्‍हें 400 सालों के बाद भी ‘हिंद की चादर’ के नाम से जाना जाता है। श्री गुरु तेग बहादुर जी ने हिंदू धर्म और कश्‍मीरी पंडितों की रक्षा के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। श्री गुरु तेग बहादुर जी ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। इस्लाम स्वीकार न करने के कारण 1675 में मुगल शासक औरंगजेब ने सबके सामने उनका सिर कटवा दिया, लेकिन औरंगजेब उनका सिर झुका नहीं पाए। श्री गुरु तेग बहादुर जी का बचपन का नाम त्यागमल था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों से युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेग़ बहादुर (तलवार के धनी) रख दिया। युद्धस्थल में भीषण रक्तपात से श्री गुरु तेग़ बहादुर जी के वैरागी मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनका का मन आध्यात्मिक चिंतन की ओर हुआ। धर्म हमें शांति और अंहिसा का मार्ग दिखाता है। श्री गुरु नानक देव जी के नक्‍शे-कदम पर चलते हुए श्री गुरु तेग बहादुर जी भी अपने काल में शांति का पैगाम फैला रहे थे। उधर, औरंगजेब किसी भी धर्म को अपने से ऊपर नहीं देखना चाहता था। वह अत्‍याचार कर हिंदुओं और सिखों का जबरन धर्मांतरण करा रहा था। मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, हिंदू और सिख महिलाओं के साथ दुष्‍कर्म और अत्याचार हो रहे थे। ऐसे में श्री गुरु तेग बहादुर जी ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया और उन्हें मुगलों के खिलाफ लड़ने को तैयार किया। जब कुर्बानी देने की बारी आई, तो सबसे आगे खड़े हो गए। कश्मीर को पंडितों का गढ़ माना जाता था, इसकी वजह ये थी कि वहां बेहद विद्वान पंडित रहते थे। तब औरंगजेब की तरफ से शेर अफगान खां कश्मीर का सूबेदार हुआ करता था। औरंगजेब ने कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार करना शुरू किया और उन्हें जबरन इस्‍लाम कबूल करने का दबाव बनाया। कश्मीरी पंडितों ने श्री तेग बहादुर जी के बारे में सुन रखा था, उन लोगों ने फैसला लिया कि मुगलों के खिलाफ अत्याचार का मुकाबला करने के लिए गुरु तेग बहादुर की मदद ली जाए। कश्‍मीरी पंडित जब श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास मदद मांगने पहुंचे, तो उन्‍होंने कहा कि औरंगजेब से जाकर कहो कि अगर तुमने हमारे गुरु का धर्म बदल दिया, और अगर उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिए, तो हम भी कर लेंगे। यह बात औरंगजेब तक पहुंचा दी गई। औरंगजेब ने श्री गुरु तेग बहादुर जी और उनके साथियों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया। औरंगजेब के आदेश पर पांचों सिखों सहित गुरु जी को गिरफ्त में लेकर दिल्ली लाया गया। आज जहां धर्म के नाम पर कट्टरता देखने को मिलती है, वहीं 16वीं सदी में श्री गुरु तेग बहादुर जी ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। कश्मीरी पंडितों ने जब श्री गुरु तेग बहादुर जी से मदद मांगी, तो वह हिचकिचाए नहीं। हिदुओं ने बताया कि उन पर मुगल बेहद अत्याचार कर रहे हैं, उन पर धर्म परिवर्तन करने का दबाव बना रहे हैं। तब श्री गुरु तेग बहादुर जी ने कहा जाओ औरंगजेब को बता दो कि पहले वह मेरा धर्म परिवर्तन कराए इसके बाद ही वह किसी अन्य का धर्म परिवर्तन करा सकता है। इसके बाद श्री गुरु तेग बहादुर जी दिल्ली आए और यहीं चांदनी चौक पर साल 1675 में 24 नवंबर उन्होंने खुद को कुर्बान कर दिया।

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